जहां सिर्फ पढ़ाई नहीं, बदलाव की शुरुआत हुई…
देवरी, सागर।
एक अच्छा शिक्षक सिर्फ पाठ नहीं पढ़ाता, वह सपने देखना सिखाता है। वह बच्चों की आंखों में भविष्य तलाशता है और विद्यालय की दीवारों के बीच संभावनाओं को पहचानता है। जब शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को नौकरी से आगे बढ़ाकर जिम्मेदारी और संकल्प के रूप में स्वीकार करता है, तो सरकारी स्कूल भी बदलाव की ऐसी कहानी लिख सकता है, जिसकी मिसाल दी जा सके।
शासकीय माध्यमिक शाला मढ़पिपरिया की कहानी कुछ ऐसी ही कोशिशों से जुड़ी है। यहां शिक्षक अशोक राजौरिया ने अपने लंबे कार्यकाल के दौरान जनसहयोग, नवाचार और विद्यार्थियों की प्रतिभा को अवसर देने पर जोर दिया। परिणामस्वरूप विद्यालय का नामांकन 13 विद्यार्थियों से बढ़कर 126 तक पहुंचा।
एक शिक्षक ने विद्यालय को केवल भवन नहीं, सीखने का वातावरण बनाया
27 फरवरी 2007 से 30 जून 2025 तक मढ़पिपरिया विद्यालय में पदस्थ रहे अशोक राजौरिया ने विद्यालय के विकास को केवल कक्षा और पाठ्यपुस्तक तक सीमित नहीं रखा।
लगभग दो एकड़ के विद्यालय परिसर में जनसहयोग से तार फेसिंग कराई गई। विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए गए और विद्यार्थियों को उनके बारे में जानकारी देने के लिए सूचना बोर्ड लगाए गए। किचन गार्डन और गणित उद्यान विकसित किए गए।
जनसहयोग से विद्यालय में डिजिटल संसाधन उपलब्ध कराए गए और विद्यार्थियों के लिए आरओ वाटर सिस्टम स्थापित कराया गया। पूरे परिसर को विषय आधारित जानकारी से युक्त प्रिंट रिच वातावरण देने का प्रयास किया गया। विज्ञान प्रयोगशाला के विकास के साथ विद्यालय के बोर में मोटर लगवाकर पेयजल व्यवस्था को मजबूत किया गया। बाथरूम और शौचालयों में नल फिटिंग जैसी मूलभूत सुविधाओं को भी जनसहयोग से बेहतर बनाया गया।
इन प्रयासों के पीछे उद्देश्य केवल विद्यालय को बेहतर दिखाना नहीं, बल्कि बच्चों के लिए ऐसा वातावरण तैयार करना था, जहां वे सीखें, सवाल पूछें और अपनी प्रतिभा को पहचानें।
सरकारी स्कूल के बच्चों को भी बड़े मंच मिल सकते हैं…
अशोक राजौरिया के प्रयासों का एक महत्वपूर्ण पक्ष विद्यार्थियों को विभिन्न प्रतियोगिताओं और शैक्षणिक अवसरों से जोड़ना रहा।
उनके मार्गदर्शन में 35 विद्यार्थियों का राष्ट्रीय मीन्स-कम-मेरिट छात्रवृत्ति (NMMS) योजना में चयन हुआ। 20 विद्यार्थियों ने INSPIRE Award प्रतियोगिता में सफलता प्राप्त की। 25 विद्यार्थियों ने राज्य स्तरीय गणित-विज्ञान प्रदर्शनी और 16 विद्यार्थियों ने राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस में सहभागिता की।
पश्चिम विज्ञान मेले की राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भी 17 विद्यार्थियों ने सहभागिता की। इसके अलावा 30 विद्यार्थियों का उत्कृष्ट विद्यालय प्रवेश परीक्षा में चयन, 15 विद्यार्थियों को अजीम प्रेमजी फाउंडेशन छात्रवृत्ति तथा 18 विद्यार्थियों का राष्ट्रीय विज्ञान मंथन परीक्षा में चयन होने की जानकारी दी गई है।
12 विद्यार्थियों को राज्य स्तरीय कालिदास महोत्सव, उज्जैन की नृत्य-नाटिका प्रतियोगिता में सहभागिता का अवसर मिला।
ये आंकड़े केवल उपलब्धियों की सूची नहीं हैं। इनके पीछे उन बच्चों की मेहनत है, जिन्हें एक शिक्षक ने यह विश्वास दिलाने का प्रयास किया कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा भी राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकता है।
शिक्षक को मिले सम्मान, लेकिन असली सम्मान विद्यार्थियों की सफलता
अशोक राजौरिया को वर्ष 2018 में राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान प्राप्त हुआ। वोडाफोन आइडिया फाउंडेशन की ओर से उन्हें एक लाख रुपये का पुरस्कार भी प्रदान किया गया। मध्यप्रदेश से राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के अंतिम छह चयनित शिक्षकों में उनका चयन हुआ।
वर्ष 2019 में उन्हें राज्य स्तरीय नवाचारी विज्ञान शिक्षक सम्मान प्राप्त हुआ। उन्होंने दो अंतरराष्ट्रीय विज्ञान महोत्सवों में सहभागिता की। इसके अलावा दैनिक विनय उजाला की ओर से प्रदान किया गया राज्य स्तरीय शिक्षक सम्मान भी उन्हें प्राप्त हुआ।
हालांकि किसी शिक्षक के लिए पुरस्कार उसकी उपलब्धि हो सकते हैं, लेकिन उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि तब होती है, जब उसके पढ़ाए बच्चे आगे बढ़ते हैं और विद्यालय की पहचान बनते हैं।
पद बदला, लेकिन सोच और प्रयास नहीं
1 जुलाई 2025 को पदोन्नति के बाद अशोक राजौरिया माध्यमिक शिक्षक से उच्च माध्यमिक शिक्षक बने। वर्तमान में वे शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, देवरी में पदस्थ हैं।
नई पदस्थापना में भी विद्यार्थियों को शैक्षणिक और सह-शैक्षणिक गतिविधियों से जोड़ने के प्रयास जारी हैं। उनके मार्गदर्शन में चार विद्यार्थियों का राज्य स्तरीय राष्ट्रीय बाल रंग प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ, जबकि दो विद्यार्थियों ने जिला स्तरीय पर्यटन क्विज प्रतियोगिता में सहभागिता की।
डिजिटल बोर्ड और डिजिटल माध्यमों के जरिए शिक्षण को आधुनिक बनाने के साथ वे विद्यार्थियों को विज्ञान, गणित, कला, संस्कृति और प्रतियोगी गतिविधियों से जोड़ने पर जोर दे रहे हैं।
एक शिक्षक, जो विद्यालय से समाज तक बदलाव की सोच रखता है
किसी सरकारी विद्यालय की तस्वीर बदलने के लिए केवल संसाधन ही पर्याप्त नहीं होते। संसाधनों का बेहतर उपयोग करने वाली सोच, नेतृत्व और निरंतर प्रयास भी जरूरी होते हैं।
अशोक राजौरिया की कहानी इसी सोच को सामने रखती है। उन्होंने जनसहयोग को विद्यालय विकास से जोड़ा, विद्यार्थियों को प्रतियोगिताओं के मंच तक पहुंचाने का प्रयास किया और विद्यालय को केवल पढ़ाई की जगह न मानकर सीखने और आगे बढ़ने का केंद्र बनाने की दिशा में काम किया।
शिक्षक दिवस पर एक सलाम…
“शिक्षक वह नहीं जो सिर्फ किताब का पाठ पढ़ा दे,
शिक्षक वह है जो बच्चे को उसकी अपनी क्षमता का पाठ पढ़ा दे।
एक शिक्षक की मेहनत से बदलती है एक कक्षा,
और एक समर्पित शिक्षक की सोच से बदल सकती है पूरे विद्यालय की तस्वीर।”
शिक्षक दिवस के अवसर पर उन सभी शिक्षकों को नमन, जो सीमित संसाधनों में भी बच्चों के सपनों को पंख देने का प्रयास करते हैं।


